मंजर भोपाली साहब की एक बेहतरीन छोटी सी ग़ज़ल यहां पेस करता हूँ। आपसे नही बिछड़े, जिंदगी से बिछड़े हैं... हम चराग़ अपनी ही, रौशनी से बिछड़े हैं.......
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